अनिल देशमुख का इस्तीफा, पर इस्तीफा तो उद्धव ठाकरे का होना चाहिये था

Category : मेरी बात - ओमप्रकाश गौड़ | Sub Category : सभी Posted on 2021-04-05 06:11:56


अनिल देशमुख का इस्तीफा, पर इस्तीफा तो उद्धव ठाकरे का होना चाहिये था

अनिल देशमुख का इस्तीफा, पर इस्तीफा तो उद्धव ठाकरे का होना चाहिये था
सचिन बझे के 100 करोड़ वसूली के टारगेट मामले में महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने इस्तीफा दे दिया. पर इस्तीफा तो उद्धव ठाकरे का होना चाहिये. बझे शिवसैनिक था और उसके तार तो शिवसेना से जुड़े थे. इसी कारण उ़द्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनते ही बझे को सेवा में बहाल कर दिया. यह ठीक है कि पुलिस विभाग गृहमंत्री अनिल देखमुख के मातहत आता है और पुलिस वे वसूली करवाने का पहला हक देशमुख का था जिसका उन्होंने इस्तेमाल किया और बकौल मुंबई के कमीश्नर रहे परमवीर सिंह, बझे को सौ करोड़ रूपये महावार का टारगेट अनिल देशमुख ने दे दिया. बार-जुआ तो छोटी मछली हैं उनसे तो यह टारगेट पूरा होने को रहा इसलिये उसने मुकेश अंबानी पर फंदा डाला. सफल हो जाता तो वह दूसरे टारगेट पर जाता. पर बात इससे पहले ही बिगड़ गई. लेकिन यह तय है कि बझे ने इसकी जानकारी अपने मूल आका उद्धव ठाकरे को जरूर दी होगी. वे चुप्पी साधे रहे.
उद्धव ठाकरे की स्थिति तो मौनी बाबा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जैसी हो गई है जो टू जी घोटाले में अपने मंत्री राजा को घोटाला करते देखते रहे और रोक नही पाए क्योंकि गठबंधन सरकार थी. राजा अपने डीएमके के आकाओं को पूरा हिस्सा देता था. मनमोहनसिंह उसे रोकते और कार्यवाही करते तो सरकार गिर जाती. यही स्थिति तो उद्धव ठाकरे की है. शायद उन्हंें सारी जानकारी थी पर वे रोकटोक करते तो सरकार गिर जाती. इसलिये चुप रहे.
यहां भी परमवीर सिंह की याचिका पर मुंबई हाईकोर्ट पर ने बेहद सावधानी के साथ चतुराई भरा फैसला दिया है कि सीबीआई पन्द्रह दिन में प्रारंम्भिक जांच करे और जरूरत समझे तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज करे और अदालत को सूचित करे. जब अदालत को सूचित करना पडेगा तो हो सकता है अदालत अपनी शक्ति का उपयोग कर पुलिस रिपोर्ट का परीक्षण कर ले और कमजोर पाने पर सीबीआई को उसके परिणाम भुगतने पड़े और मुकदमा भी वापस लेना पड़े. इसलिये स्वाभाविक है कि सीबीआई को ठोस सबूत मिलेंगे तो ही वो रिपोर्ट की दिशा में बढ़ेगी. सीबीआई तो केन्द्र की एजेंसी है वह केन्द्र को फेवर कर सकती है. इसलिये कमजोर केस में भी वह रिपोर्ट दर्ज करवाने का जुआ खेल सकती है. गृहमंत्री के खिलाफ पुलिस में प्रकरण दर्ज होना तो अनिल देशमुख के लिये शर्मनाक रहेगा. इससे बचने के लिये अनिल देशमुख ने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा. पर जिम्मेदारी तो उद्धव ठाकरे की भी बनती है. उन्हंें भी इस्तीफा देना चाहिये था.
इसके बाद यह कहने में कोई संकोच नहीं करना चाहिये कि बात खुलेगी तो दूर तक जाएगी. ठाकरे सरकार बदनामी की भंवर मंें तो फंसेगी ही. इसे कांग्रेस और शरद पवार कैसे और कब तक सहन कर पाएंगे. हो सकता है वे दबाव डालें और  उद्धप ठाकरे को बाद में ही सही इस्तीफा देना पड़े.
सारे मामले में एक बात तो साफ है कि उद्धव सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई है. वह कब गिरती है यह समय की बात है.
अदालतों के दावपेंच
परमवीर सिंह सुप्रीम कोर्ट में गये तो वहां अदालत ने कहा कि मामला तो गंभीर है इसलिये मामला हाईकोर्ट में ले जाएं. वहां हाईकोर्ट ने पूछा कि आप परमवीरसिंह (आप) तो पुलिस कमीश्नर थे. आपको जानकारी थी तो आपको एफआईआर दर्ज कर वानी चाहिये थी वह आपने क्यों नहीं किया. पुलिस कमीश्नर अपने बाॅस गृहमंत्री के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाए, सुनने में ही अजीब सा लगता है. फिर हाईकोर्ट सीधे सीबीआई को जांच को कहे यह ठीक नहीं है. उसके लिये ज्यादा सबूत चाहिये. वे नहीं थे. पर शायद सुप्रीम कोर्ट की तरह हाईकोर्ट ने भी मामले को गंभीर माना और अप्रत्यक्ष तरीका अपनाया कि पहले जांच करिये वह भी पन्द्रह दिन में और ठीक लगे तो प्रकरण दर्ज करवाएं. सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे.
 

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